गांगुली ने एक तीर से किए कई शिकार
October 8th, 2008 by Administrator | Filed under चर्चित चेहरे.तो सौरव गांगुली ने ऑस्ट्रेलिया के साथ वर्तमान श्रृंखला के बाद संन्यास लेने की घोषणा कर दी।
और इस एक तीर से गांगुली ने अपने कई “सिरदर्दों” का शिकार सफाई से कर लिया।
1.उनका सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ था “ईडियट बॉक्स” याने टीवी चैनलों के उतने ही जाहिल पत्रकार जो दिन रात सिर्फ इसी चर्चा में लगे हुए थे कि गांगुली को बोर्ड कैसे निकालने वाला है, कब निकालने वाला है, क्यों निकालने वाला है वगैरह।
गांगुली के टीम से निकाले जाने की घंटों चर्चा के अलावा इनके पास और कोई काम नहीं था। लेकिन जिस दिन से सौरव गांगुली ने रिटायरमेंट का ऎलान कर दिया, उस दिन से ये बुद्धू बक्से की फौज उन्हें छोड़ कर बाकी वरिष्ठ खिलाड़ियों के पीछे पड़ गई। सौरव का सिर्फ गुणगान दिखाया जाने लगा। यानी सौरव के सिर से 24 घंटे चलने वाली “ब्रेकिंग न्यूज” का सिरदर्द खत्म हो गया, तनाव खत्म।
2.क्रिकेट चयनकर्ताओं ने उन्हें सिर्फ पहले दो टेस्ट के लिए टीम में लिया था, वह भी 15 सदस्यीय दल में। यह तय भी नहीं था कि टेस्ट खेलने उतरने वाले अंतिम 11 खिलाड़ियों में सौरव को जगह मिलती।
क्रिकेट बोर्ड के आका जिस तरह सौरव को लगातार अपमानित करने पर तुले हुए थे, उसे देखते हुए आश्चर्य की बात नहीं होती अगर सौरव को टेस्ट में 12 वां खिलाड़ी ही बना दिया जाता।
इसीलिए संन्यास लेने की घोषणा करते समय सौरव ने बड़ी चतुराई से अपने शब्दों का चयन किया। उन्होंने कहा “ ये चार टेस्ट मेरे करियर के आखिरी टेस्ट होंगे।”
संन्यास लेने की घोषणा के बाद सौरव के पक्ष में जिस तरह देश- विदेश में सहानुभूति की लहर चल पड़ी है, उसे देखते हुए अब चयनकर्ताओं या बीसीसीआई के अन्य आकाओं की हिम्मत नहीं होगी कि सौरव को इन चार टेस्ट मैचों से बाहर रखें। सौरव अब चाहे रन बनाएं या न बनाएं, उन्हें इन चार मैचों में खिलाना क्रिकेट बोर्ड की मजबूरी बन गई है। यानी बोर्ड से दो की जगह चार मैच झपट लिए सौरव ने। “ दादा” के सिवा दिमागी शतरंज में बीसीसीआई को ऎसी मात भला और कौन खिलाड़ी दे सकता था?
3.इन सारे दिमागी तनावों से मुक्त होंगे, तो सौरव के सामने मौका है बढ़िया खेल दिखा पाने का। अगर सफल हो गए तो संन्यास छोड़ कर खेलना जारी रख सकते हैं। अगर नहीं हुए तो भी बोर्ड के हाथ बेइज्जती नहीं होगी और वे अपनी शान के साथ रिटायर हो सकेंगे।
4.ऑस्ट्रेलिया के सामने खेलना आसान नहीं होता, चाहे अपने देश में हो या उअंके। जिन “युवा” खिलाड़ियों के दम पर वरिष्ठ खिलाड़ियों को निकालने की बात हो रही है, उनमें से अधिकांश अब तक के अभ्यास मैचों या ईरानी ट्रॉफी मैचों में अधिक सफल नहीं रहे हैं। खुद धोनी का फॉर्म ढीला- ढाला चल रहा है।
ऑस्ट्रेलियाई टीम दिमागी खेल खेलने में माहिर है। उनके सामने सिर्फ क्रिकेट नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक चतुराई भी जरूरी होती है सफलता के लिए। यह चतुराई अनुभव के कारण वरिष्ठ खिलाड़ियों में है। इस ऑस्ट्रेलियाई अग्नि परीक्षा में युवा ब्रिगेड सफल हो सकेगी, यह जरूरी नहीं। अगर उसे सफलता नहीं मिली तो वरिष्ठ खिलाड़ियों के सिर पर लटकी तलवार कुछ समय के लिए हट सकती है।
ये सारे दांव गांगुली ने अपनी संन्यास की चाल में छिपा रखे हैं। दिमागी खेल खेलने में उन्हें कितनी महारत हासिल है, यह बीसीसीआई से ज्यादा ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी जानते हैं। पूछिए रिकी पोंटिंग से जिन्हें कभी टॉस के लिए मैदान पर 20 मिनट इंतजार करवा कर भारतीय कप्तान सौरव गांगुली ने औकात बताई थी।
इसी दिमाग के बल पर तो सौरव ने ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान को उन्हीं की धरती पर हराया था। बीसीसीआई उनके हाथ से बल्ला छीन सकती है, उनके दिमाग की धार कुंद नहीं कर सकती।
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